मन के हारे हार , मन के जीते जीत

ये कहानी मेरी अपनी कहानी है मैं बचपन से बहुत ही शांत पर ग़ुस्सेवली थी कारण क्या था वो तो मैं खुद भी नही जानती
पर आज मैं पहले जैसी बिल्कुल भी नहीं हूं । जी हाँ जो लड़की बचपन में बस शांत और एकांत में रहना पसंद
 करती थी आज उसे मस्ती करने मे बहुत मजा आता हैं फ्रेंडशिप करना बेहद ही पसंद है, जो पहले कभी शायद कभी कभार हीOutdor games खेलती हो आज उसका मन हर रोज कुछ नया ओर intresting करने का करता है।
          आखिर क्यों ?  यही सोच रहे हो न आप भी, इसका कारण जो मुझे लगता है वो ये है कि मेरे parents ने मुझे
कभी push या प्रोत्साहित नही किया , उन्होंने बस मेरी केअर की । उनकी care ओर over protective हॉने के कारण मैंने कभी खुद के बारे मे सोचा भी नही कि मेरे लिए क्या सही है और क्या गलत।मैं पूरी तरह बस उन्ही पर डिपेंड थी हर काम पूछ के करती , कभी कोई रिस्क नही लिया था लाइफ में। इन सब बातों से आपको पता चल रहा होगा कि
मैं कितनी कमजोर थी। इस सबसे भी ऊपर ये बात कि मुझे बचपन से ही ऐसी बीमारी थी जिसका कोई इलाज नही। जी
हाँ, सही सुना आपने मुझे एक लाइलाज बीमारी है वैसे तो ये आजकल बहुत से लोगो को हो रही है आज के वातावरण में बदलाव के कारण और lifestyle के वजह से और भी बढ़ती जा रही है। पर मेरी जेनेटिक है जी मुझे अस्थमा है
और जिसका अभी तक कोई इलाज नही उपलब्ध जो इसको जड़ से खत्म कर सके।
                मेरे दादाजी को भी यही भयंकर बीमारी थी हमने उनकी बहुत बत्तर हालत देखी है इसलिए मेरे पेरेंट्स को मेरी अधिक चिंता थी। कि एक तो बच्चा ऊपर से लड़की ,शादी के बाद इसका क्या होगा। जाहिर सी बात है हर माँ बाप को अपने बच्चों की फिक्र होती है उन्हें भी थी। पर आज मैं 99% स्वस्थ हूँ पहले की तुलना में।अब आप सोच रहे होंगे कि इस बीच ऐसा क्या हुआ हुआ जो इतना फर्क आ गया।तो हुआ ये कि शादी के बाद ससुराल में कोई उतना प्रोटेक्टिव नही था जो मेरा इतना ध्यान रखता जितना माँ पापा ने रखा। वहाँ बस फॉर्मैल्टी सी होती थी कि अच्छा तावियत ठीक नही तो दवा लेलो और लग जाओ काम पे। तकलीफ तो बेहद होती थी  पर कुछ भी किआ नही जा सकता था उधर उम्र भी कम थी तो किसी से कुछ कहने का साहस भी नही होता था चुपचाप सब सहना ही पड़ता  था , चाहे हँस के या तो फिर रो के। बस मेरे पति ही ऐसे थे जिनको सही मायने में मेरी परेशानी समझ आती थी पर वो भी कितना ध्यान रख सकते थे सुबह काम पे जाते शाम को आते। 4 साल तक  ऐसे ही चलता रहा उसके बाद लाइफ में एक टर्न आया हस्बैंड को बाहर जॉब मिल गई और हम दिल्ली शिफ्ट हो गए तब तक ईस्वर ने हमे एक प्यारा सा बेटा दे दिया था और हम बस उसका बचपन एन्जॉय करते हुए हमने अपनी lifestye को थोड़ा थोड़ा कर के चेंज कर ही रहे थे ,तब तक 5 साल बीत चुके थे और अब मेरे पास एक प्यारी सी पारी भी आ गई थी ।तभी धीरे धीरे पता चला कि मेरे दूसरे बच्चे की डिलीवरी के बाद से बैक में pain बेहद बढ़ गया था । एक दिन अचानक बैठ के जैसे ही उठी कमर सीधी नही हुई इतना असहनीय दर्द हुआ कि बताना मुश्किल है। जैसे तैसे हॉस्पिटल पहुँचे ऑर्थोपेडिक को दिखाया उसने सारे टेस्ट्स करे पता चला कि बैकबोन में गेप आ रहा है सुनते ही पैरों तले से जमीन खिसक गई  हम दोनों के, और तो और बच्चे दोनो छोटे है क्या होगा ये सब सोच के हालत ही खराब हो गई थी जिस समय मेरा बेटा 6  और बेटी मात्र 1 साल की थी। 10 दिन लगातार दोनो टाइम दर्द के इंजेकशन और पूरी तरह बिस्तर में, केवल बेटी को फीड करबाती थी जैसे तैसे, और फिजियोथेरिपी दोनों टाइम चालू थी साथ ही आयरन और कैल्शियम की भर भर के पैकेट गोलियां कुल मिलाकर लगता था मानो लाइफ ख़त्म हो गयी बस। तभी एक दिन डॉक्टर ने बोला कि आप वजन कम करो वरना और भी बीमारियां हो सकती है आपको जैसे कि अर्थराइटिस।उन दिनों लाइफ मानो एक दम नीरस लगने लगी थी।
                तभी अचानक हस्बैंड ने अपने कैरियर में चेंज  करने की सोचा पर वो किसी भी हालत में हमे अकेले दिल्ली छोड़कर पुणे आने को राजी नही हुए मैं भी नही चाहती थी कि हम कही और शिफ्ट करें वो भी जब कि मुझे इतने हेल्थ इशू रहते थे। पर फिंर कुछ नही अपने बच्चों के फ्यूचर के लिए खुद को स्ट्रांग किया जब भी बैक में दर्द होता तो एक्सरसाइज ओर मेडिसिन ले लेती अस्थमा अटैक हॉने पर रोटाहेलर और ऐसे ही 3 महीने बीत गए। और 3 महीने बाद मैं भी बच्चों के साथ यहां आकर रहने लगी थी। बेटे का एड्मिसन कर दिया था नये स्कूल मे पर बेटी अभी छोटी थी तो कुछ दिन और बाकी थे उसके स्कूल जाने में । मैं भी खुद तब  ही कर सकती थी जब दोनों बच्चे स्कूल जाने लगते तब तक क्या? फिर मैं ज्यादा से ज्यादा वक्त इंटरनेट सर्फिंग में बिताने लगी इंस्पिरेशनल स्टोरीज पढ़ती ओर अपने अंदर साहस तराशती ऐसा करते करते धीरे -धीरे ऐसा हो गया कि मेरे में कुछ करने की हिम्मत और अपने बच्चो के लिए जीने ओर उनका अच्छे से ध्यान रखने का जज्बा बढ़ने लगा और उसके लिए मैने सबसे पहला काम वो किया जो मुझे खुशी देता ।
              अब मैं रिस्क लेने से नही डरती थी, तभी मेरी बिटिया को प्ले स्कूल डाल दिया अब मेरे पास अपने लिए कुछ करने का समय था। बेटी का स्कूल केवल डेढ़ घण्टे का था तो मैंने उसके स्कूल के सामने के गार्डन में ही रुकने का फैसला किया वही बैठकर मैं छुट्टी होने का वेट करती थी। वहां पर बहुत से लोग जॉगिंग ,वाकिंग और एक्सरसाइज करते थे मैं भी करना चाहती थी पर इसके पहले मैंने कभी भी ऐसा कुछ नही किया था तो असहज लगता था ये सब मुझे। पर इतनी देर करती भी क्या धीरे धीरे टहलना शुरू किया। ऐसे ही कुछ टाइम बाद मुझमे थोड़ी फुर्ती बढ़ गई तो सोचा ब्रिस्क वाक करनी चाहिए जिससे वजन भी तेजी से घटता है। तो नेक्सट डे से शुरू किया 5 मिनट में मेरी हालत खराब, एक तो अस्थमा दूसरा ओवर वेट सांस फूलने लगी पैर दर्द हुए पर हिम्मत नही हारी । जितना हुआ उतना किया रुक के तो कभी जल्दी किया पर बन्द नही किया क्योंकि मैं जानती थी अब नही तो फिर कभी नही । क्योंकि ऐज अगर ज्यादा होगई तो फिर मैं कुछ नही कर पाऊँगी। इसलिए चालू रखा धीरे धीरे बैलेंस डाइट लेना शुरू किया ओवर ईटिंग बंद की, वाक दोनो टाइम शुरू की और काफी फर्क दिखने लगा 2 महीनों में ही 4 से 5 kg वजन कम हो गया था मेरा, जिससे मेरा हौसला ओर बढ़ गया था और स्टैमिना भी। तो फिर मैंने नेट से बहुत सी जानकारी इकट्ठा की और उस सब का समय समय पर प्मेंप्रयोग लाने लगी । यहॉ पर मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी कि मुझे वजन कम करने के लिए वो सब चीजें खानी हैं जिनकी अस्थमा में मनाही होती है जैसे खासकर खट्टा और ठंडा और वजन कम करने में वही फल ज्यादा अच्छे होते है जैसे कि नींबू, संतरा, मौसमी,अनन्नास स्ट्रोवेरी इत्यादि और पेय जैसे छाछ दही निम्बूपानी जुसेस आदि। मैने सब खाया पर सही समय और तारीखों को पढ़कर जिसमे मुझे इंटरनेट से बहुत मदद मिली ।अब मैंने नार्मल वाक को जॉगिंग में बदलना शुरू किया योग शुरू किए आउटडोर गेम खेलना सुरु किया जैसे फुटबॉल, बैडमिंटन और साइक्लिंग । जिससे न केवल मेरा वजन 10 kg घटा बल्कि मेरा बैक का प्रॉब्लम ना के बराबर हो गया और तो और मेरे लाइलाज बीमारी जी हाँ वही जिसने सब की नाक में दम कर रखी थी वो भी अब मुझसे दूर ही रहना पसंद करती है अब मैं अपनी लाइफ बहुत अच्छे से जी पा रही हु मैं बेहद फिट ओर कॉंफिडेंट हूँ। मेरे बच्चे भी मेरे इस हौसले को सराहते है कि जिसको चलने मात्र से ही सांस फूलता था आज वो दौड़ रही है साइकिल चला रही है ,और मुझे ये सब देख कर बहुत खुशी होती है।
                     और इस तरह मैने अपनी कमजोरी पर विजय पा ली मैने इस कहावत का भी अनुसरण किया है कि मन के हरे हार है और मन के जीते जीत। और यह बिल्कुल सच है जब तक हम खुद को हारने नही देते तब तक हमें कोई हरा नहीं सकता चाहे फिर कोई भी बीमारी ही क्यों न हो। पर इस सब के बीच मेरे पति जे योगदान को मैं कैसे भूल सकती हूं जिन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया है कि मै कुछ भी कर सकती हूं। आप सबको मेरी ये सच्ची कहानी जरूर प्रेरित करेगी आशा करती हूं। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद



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